सनातन टुडे दर्शन
मनुस्मृति
सदियों विदेशी आक्रांताओं से त्रस्त भारतीय समाज आज भी अविरल है। हज़ार वर्षीय आक्रांता शासित समाज संस्कृति संरक्षण मनुस्मृति आदर्शों की उपलब्धि है। पेड न भी बचे बीज बच जाये तो प्रजाति सुरक्षित होती है। मनुस्मृति मानवता बीज संरक्षण सूत्र की अनुपम धरोहर है। मनुस्मृति को विश्व के 'आदि संविधान' का गौरव प्राप्त है। महान दार्शनिक प्लूटो के अनुसार "मनुस्मृति सामाजिक व्यवस्था का आदर्श स्वरूप है"। रूसी समाजशास्त्री पी.डी औसमेंस्की के शब्दों में "मनु की वर्णाश्रम व्यवस्था मानव समाज की श्रेष्ठतम व्यवस्था है। गुण-कर्म आधारित वर्णव्यवस्था से श्रेष्ठ अन्य कोई समाजिक व्यवस्था मानव समाज के लिए सोची नहीं जा सकती है। मनुस्मृति व्यवस्था साम्यवाद और पूंजीवाद दोषों से रहित है,परन्तु दोनों की विशेषताएं निहित हैं। मनुष्य जाति के समग्र उत्थान की सर्वश्रेष्ट व्यवस्था मनुस्मृति है"। मनुस्मृति की रचना शैली 'प्रवचन शैली' है। इसके प्रवचन कर्ता स्वायम्भुव मनु हैं। बाद में मनु के शिष्यों ने प्रवचन संकलन कर ग्रंथ का रूप दिया। आचार्य वृहस्पति ने मनुस्मृति को सर्वोच्च स्मृति बताया है। श्रीराम के समय में मनुस्मृति को धर्मनिश्चय करने में अत्याधिक मान्यता थी। महाभारत के अनेकानेक श्लोक में भी मनु विशिष्ट स्मृतिकार के रूप में वर्णित हैं। अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार वे जब भारत आये तो भारत और समस्त दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र के देशों में संविधान के रूप में मनुस्मृति को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त थी। अमेरिकन इंसाइक्लोपीडिया में भी मनु को मानव-जाति का आदिपुरुष और आदि-समाज व्यवस्थापक बताया गया है। अनभिज्ञतावश कुछेक भारतीय जनमानस मनुस्मृति को जातिगत भेदभावपूर्ण ग्रंथ माानते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि मनुस्मृति संस्करण वर्ण-व्यवस्था का निर्धारण मूलत: शिक्षा एवं कर्म आधारित है; अर्थात बालक के वर्ण या जाति का निर्धारण माता-पिता से नहीं होता। किसी भी वर्ण में उत्पन्न बालक को माता-पिता अपने वर्ण या अन्य किसी भी वर्ण में दीक्षित करा सकते हैं। शैक्षणिक काल में अन्तत: वर्ण का निश्चय गुण,कर्म,स्वभाव शिक्षा के आधार पर आचार्य करता है। बाद के जीवनकाल में कभी भी शिक्षा,कर्मो या व्यवसाय के आधार पर उसमें परिवर्तन हो सकता है। मनुस्मृति में 'जाति' शव्द 'वर्ण' के पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त हुआ है। भेदभावपूर्ण व्यवस्था का लांछन लगाते लोगों को निम्नलिखित मनुस्मृति श्लोकों को देखना चाहिए- अष्टापाद्यन्तु शूद्रस्य स्तेये भवति कैल्बिषम्। षोडशैव तु वैश्यस्य दात्रिशत् क्षत्रियस्य च।। ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्ण वापि शतं भवेत्। दिगुणा वा चतु: षष्टिस्तदोषगुणविदि स:।। अर्थात "जो कुछ विवेकी होकर चोरी करे उस शुद्र को चोरी से आठ गुणा,वैश्य को सोलह गुणा,क्षत्रिय की बत्तीस गुणा,ब्राह्मण को चौंसठ गुणा दण्ड होना चाहिए। जो जितना समझदार, उसको अपराध में उतना ही अधिक दण्ड विधान मनुस्मृति में है। आखिर कैसे कहा जाए कि जातीय भेदभाव ग्रंथ मनुस्मृति है। कार्षापणं भवेद् दण्डयो यत्रान्यं प्राकृतो जन:। तत्र राजा भवेद् दणडय: सहस्त्रमिति धारणा।। अर्थात जिस अपराध में किसी साधारण मनुष्य को एक पैसा दण्ड किया जाता हो उसी प्रकार के अपराध में राजा को सहस्त्र पैसे का दण्ड दिया जावे। उपर्युक्त न्याय व्यवस्था वर्णित मनुस्मृति ग्रंथ को जातिगत भेदभाव का ग्रंथ कैसे माना जा सकता है। समान नागरिक अधिकार वर्तमान युग में भी मनुस्मृति संस्करण भेदभाव रहित न्यायिक दण्ड की परिकल्पना बेमानी है। आज की व्यवस्था मे दो महत्वपूर्ण प्रजाति मसलन अधिकारी तथा चपरासी नीतिगत घोषणाओं पर सरसरी निगाह दौडाने पर मनुस्मृति संस्करण वर्ण व्यवस्था भेदभाव रहित होने का प्रमाण है। मनुस्मृति संस्करण में राजा को आमजन से कई गुणा ज्यादा कठोर दंड विधान है।राज्यपाल-राष्टपति न्याय व्यवस्था से बाहर के मानवीय जीवन हैं। कठोर सजा की बात तो दूर उन्हें न्यायालय में बुलाया भी नहीं जा सकता है।राष्ट्रपति के परिवारिक सदस्यों तक को सजा नहीं होती है। विगत दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन अपने पुत्र की सजा को अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर माफ कर दिया। भारत में ऐसा नहीं होता है,कहना कठिन है।बेशक, वर्तमान न्याय व्यवस्था में राजा तथा उनके दरबारियों को लिए सजा नही होता है। लोकतांत्रिक आवरण सजा का प्रवधाान मिलता है लेकिन प्रायोगिक तौर पर वह अधिकतम निष्क्रिय होता है। राष्टपति-राज्यपाल तो दंड विधान से बाहर हैं। उनके दरबारियों के लिए दिखावे के लिए सजा है बाबजूद उनके दंडित होने की संभावना नगण्य है। जैसा कि अमेरिकन राष्ट्रपति ने अपने पुत्र को अपने विशेषाधिकार का लाभ दिया। नैैतिक मूल्यों से दूर का सामयिक सामाज की राजा प्रजाति अमूमन स्वयं व अपने दरबारियों के लिए विशेषाधिकार सुनिश्चित करता वर्तमान व्यवस्था है।
मनुस्मृति
मनुस्मृति व्यवस्था में जो जितना ज्ञानी समझदार उसको उतना गंभीर सजा प्रावधान है। मनुस्मृति व्यवस्था में सजा प्रावधान जातिगत नहीं है। कोई विशेषाधिकार सुरक्षात्मक कवच भी नहीं है। बाबजूद इसके मनुस्मृति को जातिगत भेदभाव ग्रंथ की उपमा देकर अपने गौरवशाली पुर्वजों की मानव समाज व्यवस्थापक बेमिसाल दर्शन को कमतर करने का जघन्य अपराध हैं। दरअसल, मनुस्मृति सांगोपांग अध्ययन यह आभास कराता है कि हमारा सामाजिक आवरण जाने अनजाने मनुस्मृति विधानों के इर्द गिर्द मंडराता है। सामाजिक मान्यताओं, प्रचलनों में मनुस्मृति विधान आज भी विद्यमान हैं। हां,अनभिज्ञ मानविकी को यह पता नहीं होता है कि वे जिस परंपरा,परिपाटी का अनुकरण करते हैं,उसका उद्गम विंदू मनुस्मृति ग्रंथ है। अंतर्राष्टीय बाजारवाद ने मानवाधिकार से लेकर अन्यान्य विषयो के न्यायाधिकरण संस्थान बनाए हैं। सभी संस्थान मनुस्मृति समाहित है। न्यायालयों से लेकर सामाजिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में मनुस्मृति प्रावधान विराजमान है। निस्संदेह,मानव समाज संविधान को नजरअंदाज कर कोई सबल समाज निर्माण की परिकल्पना नहीं कर सकता है। बेशक,नीतिगत घोषणाओं की यथार्थवादी मापदंड मनुस्मृति संस्करण है। मनुस्मृति संस्करण का हिन्दू कोड बिल परिणाम वर्तमान प्रगतिशील हिन्दू समाज है। कुछेक मंचासीन नेताओं का मनुवादी प्रलाप शव्द-वाक्य प्रकृति प्रायोजित है।दरअसल,मनुस्मृति पारिवारिक जीवन भुलते दौर के समाधान मनुवादी प्रलाप के नेतागण हैं। विगत वर्ष-2023 में रामचरितमानस की कुछेक प्रति उत्तरप्रदेश में जलायी गयी थी। तत्पश्चात उसी समय दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के पुस्तक विक्रेताओं को रामचरितमानस जबरदस्त मांग के समक्ष झुकना पडा था। रामायण भुलते सामाजिक संस्करण कालखंड में रामचरितमानस मांग बढोतरी प्रकृति प्रायोजित घटनाक्रम था। कुछेक नेताओ का मनुस्मृति प्रलाप भी प्रकृति नियोजित है। मनुस्मृति प्रचारक भाषणबाज नेताओ को भगवान मनु आशीर्वाद प्रचुर मात्रा में देते है। क्या मनुस्मृति प्रचार-प्रसार नेतृ मायावती को किसी प्रकार की कमी रही है? आखिर मनु भगवान अपने किसी आराधक को कमजोर क्यों रहने देगें? बाबा साहब अंबेडकर मनुस्मृति प्रति जलाने वाले पहले भारतीय नेेता थे। हिन्दू कोड बिल एवं संविधान का प्रमुुख आधार मनुस्मृति है। यह गौरतलब है कि कोडिफाइड बिल तथा संविधान दोनों के प्रारूप तैयार करने वाले भी बाबा साहब अंबेडकर थे। प्रचार-प्रसार से लेकर कोडिफाइड संस्करण में मनु भगवान को चिरस्थायित्व प्रदान करने का पारितोषिक उन्हें भारत रत्न के रूप में मिला। मानवता के प्रति इमानदार कर्तव्य निर्वहन कभी निष्फल नहीं हो सकता है। बाबा साहब अंबेडकर जीवन भारतरत्न पारितोषिक उसका प्रमाण है।
मनुस्मृति
बाबा साहब अंबेडकर के बाद की राजनीतिक समाज अटल बिहारी वाजपेई , प्रणव मुखर्जी, नरसिंहा राव, कांशीराम,मायावती,लालूयादव मनुस्मृति जानकार राष्ट्रीय नेता व्यक्तित्व रहे हैं। फलत: सबने अपने हिस्से की जिम्मेदारी बखूबी निभायी है। उनके दौर के संसदीय पारित समग्र चिंतन कानून इसके ज्वलंत प्रमाण है। दंडात्मक विधान के दो महत्वपूर्ण अवयव मनसा(Mens rea) तथा कर्मणा(Actus rea) की भागीदारी साबित करने की है। किसने क्या भाषण दिया,गौण है। संसद ने क्या पारित किया वही ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय भाषा नीति पर तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत की प्रस्तुति चिंतन दूूरदर्शी थी लेकिन घोषणा उस रूप में नही हो सका। वे दूूरदर्शी थे,आज गौण है। जो घोषणा हुआ उसका आज राष्ट्र शिकार है,वर्तमान राजनीतिक संचेतना है। दरअसल, विगत दशकों की सरकारों में मनुस्मृति संसदीय प्रस्तुति कमजोर पडी है। संभवत: मनुस्मृति जानकार नेताओं की अनुपलब्धता मूलवजह है। मनमोहन सिंह सरकार पारित पारिवारिक कानून:2005 से आज भारतीय समाज त्रस्त है। आगे की तस्वीर ज्यादा भयावह प्रतीत होती है। गुड़गांव(हरियाणा) की आसमान छुती जमीन की कीमतें,गगनचुंबी महंगी इमारतों ने भाई बहन के रिश्तों तक को रेखांकित कर रहा है। मनमोहन सरकार की अदूरदर्शिता का शिकार व्यापक राष्टीय समाज बने, उससे पहले समाधान आवश्यक है। भगवान मनु को भुलने का परिणाम धातक ही हो सकता है। अनगिनत महीनों के गर्भपात कानून-2020 प्रस्तुति तत्कालीन महिला विकास मंत्री की मनुस्मृति अज्ञानतापूर्ण व्यक्तित्व अपने टाइम्स ऑफ इंडिया लेख में विश्व प्रथम का दावा कर सकता है। यह चिंतनीय है कि विपक्ष में भी मनुस्मृति जानकार प्रणब मुखर्जी अब नहीं हैं जो ऐसे गैैरजानकार व्यक्तित्वों को कम से कम कटघरे में खडे कर सकें। मनुस्मृति में लड़का-लड़की विवाह उम्र 3 से 5 वर्षो का अंतराल आवश्यक बताया गया है। वर्तमान सरकार को शादी के वैधानिक उम्र की समानता चिंतन हेतु कमिटी तक गठित करनी पडी। उन्मूलित अंतराल का वैधानिक शादी समान उम्र संसद में पारित नहीं हो सका। लेकिन,फिजूलखर्ची उच्चस्तरीय कमिटी मनुस्मृति संसदीय अनभिज्ञता परिलक्षित है। नीतिगत घोषणाओं की वैधानिकता जांच करनेवाले आधुनिक न्यायाधीशों के मौलिक अधिकार,मानवाधिकार मूलविंंदू कुछेक निर्णयों में अज्ञात प्रतीत होते हैं। संभवत: आधुनिक भाष्यकार भगवान मनु से श्रेष्ठ समाजिक चिंतन का दंभ रखते हैं। मनुस्मृति मानकों से बाहर के पारिवारिक निर्णय भारतीय समाज का कितना कायाकल्प कर सकते हैं,कहना कठिन है। बाबजूद इसके उच्चतम न्यायालय परिसर में मौलिक अधिकारों व मानवाधिकारों के सर्वश्रेष्ट मानक अंसंस्थापक स्वायम्भुव मनु की मूर्ति स्थापित है,संतोषप्रद है। बेशक, न्यायाधीशों को स्वायमभुव मनु मूलतत्वों का परिपालन ही सर्वश्रेष्ट समाज परिकल्पना साकार कर सकता है। संक्षेप में, यह गौरतलब है कि मनुस्मृति जानकार नेताओं की कमी का शिकार आज की संसदीय संस्करण है। स्पष्टत: विगत दशक की कोई ऐसी संसदीय घोषणा नहीं है जिसमें मनुस्मृति विधानों की अवहेलना न दिखती हो। हमें मनुस्मृति जानकार नेता व्यक्तित्वों की संसदीय उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी।हम विश्व अग्रणी समाज बनें,इस हेतु हमें भगवान मनु को विस्मृत नहीं करना होगा,यथार्थवादी सत्य है। विश्व स्तरीय दार्शनिकों, इतिहासकारों, अन्यान्य देशों की मनुुस्मृृति पालित संविधानों की संजीदगी को हम खुद ही भूल रहें हैं,दुखद है। इसके लिए, इतिहास हमें शायद ही माफ करे। हमारे पास सबकुछ है। उद्गम स्थल, विंदू भारतवर्ष है। कदाचित भूखा प्यासा भी भारतवर्ष है, संसदीय नीतिनियंताओं का दोष है। मनुस्मृति विगत दशक में कौमा दौर में जा चुका है। क्या सता के चकाचौंध में गैर मनुस्मृति जानकार नेताओं को शिक्षा मंत्री से लेकर महिला विकास मंत्री का खामियाजा राष्ट्र झेल सकता है? इतिहास जबाव मांग सकता है- भारत में मनुस्मृति जानकार व्यक्तित्व शिक्षा मंत्री क्यों नहीं बनाए जा सके? इतना ही नहीं, मनुस्मृति नामकरण संस्कार व्यवस्थाओं की खुलेआम उल्लंघन करता जीआर-2016 का खामियाजा यह है कि अब कोई भी संगठन,सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन अखिल भारतीय, राष्ट्रीय शव्द प्रयोग नहीं कर सकते हैं। फलत: अखिल भारतीय आदि हिन्दी नामों को भूलकर आल इंडिया आदि शव्दों से रजिस्ट्रेशन बदस्तूर जारी हैं। वह दिन दूर नहीं जब अंग्रेजियत नाम रजिस्टर्ड ट्रस्ट संगठनों, सोसाइटीज से राष्ट्र आच्छादित होगा। समग्र गांधी ने अंग्रेजों को विदा किया। नामकरण संस्कार मनुस्मृति संस्करण अनभिज्ञ नेताओं ने अंग्रेजियत नाम संस्थान अच्छादित राष्ट्र की नीतिगत घोषणा दुखद है। बेशक,भगवान मनु को विस्मृत करने का खामियाजा भयावह है। बेशक,हमारी यह कमी ऐतिहासिक है।राष्ट्रीय डाक्टर आगे आयें तथा मनुस्मृति अनुपलब्धता का ईलाज करें,राष्ट्र देवता निवेदित है। मानव समाज का संविधान मनुस्मृति है, इसके जानकारों की वृहद फौज संसदीय आवश्यकता है। राष्ट्र मनुस्मृति अध्याय जानकार आच्छादित बने,सामयिक चिंतन अपरिहार्य है। बहरहाल; 1. राजनीतिक बयानबाज शंकराचार्यों को संसद में मनुस्मृति भाषण हेेतु बुलाया जाना चाहिए।सभी सांसदो की उपस्थिति का अल्टिमेटम होना चाहिए ताकि अधिकतम सांसद मनुस्मृति आख्यानों को समझ सकें। 2. राष्ट्रीय शिक्षाविद पुस्तक बाजार में अधिक से अधिक मनुस्मृति आधुनिक स्वरूप प्रस्तुत करने की कोशिश करें। समग्र चिंतन आधुनिक स्वरूप जो पढने में बोझिल न हो,आम भाषा में उपलब्ध कराने की रणनीति शिक्षाविद् प्रस्तुत करें। इसाईयत चर्च की तर्ज पर मनुस्मृति की प्रति मुफ्त में सबको वितरित किया जाना चाहिए। 3. शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में मनुस्मृति आख्यान शामिल हों। कक्षा अनुरूप मनुस्मृति खुराक पाठ्यक्रम में अनिवार्य किया जाए। 4. मनुस्मृति राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित हो। मनुस्मृति व्याख्यान, प्रवचन कर्ताओं के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार,प्रोत्साहन आदि की व्यवस्था बने। 5. राजनीतिक पार्टियां अपने नेताओं से मनुस्मृति पाठ का शपथ-पत्र लें। अंत में, मनुस्मृति जानकार संचेतित व्यक्तित्वों, नीति-नियंताओं की बहुलता से राष्ट्र अच्छादित बने,कामना है। पत्रिका का यह मनुस्मृति प्रस्तुतिकरण स्थायी स्तंभ बनकर अपनी हिस्से की जिम्मेदारी सुनिश्चित करता रहे,संरक्षक सत्ता समक्ष प्रार्थी है।।
अग्निपथ योजना
महात्मा गांधी के शव्दों में "वर्ण व्यवस्था प्रकृति का अटूट सत्य है" का भारतीय सेना स्वरूप"जवान तथा अधिकारी" क्रमशः 97 % तथा 3% संख्याबल में चिन्हित है। आमतौर पर सेना विभाग मानविकी सुरक्षात्मक जिम्मेवारी का मानव संसाधन माना जाता है तो जीडीपी आकलन में सेना उत्पादकता गौण होता है।दुर्भाग्यवश,अपरिमित संभवनाओं की उर्वर सेेना विभाग वृहद संख्याबल मानविकी को सुुरक्षा गार्ड आरक्षण आश्रित वर्तमान संसदीय चिंतन अग्निपथ योजना दुखद है। अमेरिकन इतिहास के अबतक 47 राष्ट्रपतियों में 33 सेना विभाग प्रशिक्षित सैनिक रहे हैं। परिणाम प्रेरणादायी है। वस्तुुत: आधुनिक भारतीय नीति-नियंता विदेशी व्यव्स्था अनुभवों का कार्बन कापी लागू कर वाहवाही लेना चाहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भारतीय आवश्यकता,परिवेश कार्बन कापी नीति देश से भिन्न हैं। हम विश्व के अधिकतम संख्याबल वाले देश हैं,हमारी प्राथमिकताएं छोटे समूह के देशों से अलग है। कोई विदेशी सफल योजना आवश्यक नहीं है भारत में भी सफल हो। किसी नये व्यक्ति को जबरन पेड पर चढने को उत्साहित करना फलत: व्यक्ति सीधे जमीन पर गिरता है। समग्र दर्शन चिंंतन बगैर संसदीय पारित कानून कमोवेश वैसे ही हैं। समग्र चिंतन बगैर विदेशी कापी पेस्ट कानूनों में अग्निपथ योजना है। सेना विभाग परिक्षेत्र एवं सीविल सोसाइटीज नौकरी दोनों राष्ट्र सेवा हैं लेकिन उनमें एक विशिष्ट अंतर है। सिविल सोसाइटीज सेवा क्षेत्र एक शिक्षक अनुपस्थिति का अधिकतम दुुष्परिणाम असफल छात्र हो सकते हैं। उन असफल एकेडमिक छात्रों में भी भारतरत्न सचिन तेंदुलकर से लेकर महान न्यूटन सिद्धांत विराजमान रहेगें। जबकि भारतीय वायुसेना के अंतिम पायदान के किसी सफाई कर्मचारी की लेटलतिफी, गैरसूचित अनुपस्थिति परिणामस्वरूप फायटर विमानों की कुछेक मिनटों, सेकेंड की लेटलतीफी, देरी भारतीय सीमा परिवर्तन की अकथनीय पीडा दे सकती है। क्या ड्रैगन चीन के समक्ष सन् 1962 की हमारी कमजोरी का कोई विकल्प अबतक प्राप्त हो सका है? संभवत: यही कारण है सैनिक कानून राष्ट्रीय खजाने,अर्थशास्त्रीय जीडीपी आकलन चिंतन से बाहर का विषय रहे हैं। सिविल सोसाइटीज नीति नियंताओं को "भूखे पेट भजन नहीं होय गोपाला ले तेरी कंठी ले तेरी माला" मुहावरे को याद करना चाहिए क्योंकि वह दिन दूर नहीं जब अग्निवीर भी ऐसे मुहावरों को दुहराते सुने जायें। निस्संदेह,अग्निवीर राष्ट्रीय खजाने की बोझ नहीं माने जा सकते हैं। मानव इतिहास के सभी कालखंडों में सैनिकों की अपनी विशिष्ट अहमियत रही है, किसी भी कालखंड में सैनिक राष्ट्रीय खजाने पर बोझ नहीं माने गए। अन्यान्य खर्चों की कटौती करते हुए भी सैनिक वेेतन भुगतान को वरीयता देने का इतिहास अध्याय है। तृतीय विश्व युद्ध के मुहाने पर खडे मानव समाज में सैनिक तस्करी की घटनाओं में बेेरोजगार अग्निवीर भूल चूक के दुष्परिणामों से राष्ट्र बेखबर है। विगत दिनों बारह भारतीय नवयुवक रूस सैनिक तस्करी अभियान का हिस्सा बनते पकडे गए। अग्निपथ योजना के वैसे अग्निवीर जिन्हें भारतीय सेना विभाग चार वर्षीय अनुभव प्राप्त हो, सैनिक तस्करी अभियान की कोई भूल चुक राष्ट्रीय खतरे की घंटी बांधने जैसा है। सेना समग्र चिंतन से दूर सिविल सोसाइटीज नीति-नियंताओं का खामियाजा राष्ट्र भुगतान करे,उससे पहले सजगता अपरिहार्य है। यह अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि मानव इतिहास का श्रेष्ठतम भारतीय समाज पृथ्वीराज चौहान शासकीय व्यक्तित्वों की कमियों तथा सेनापति मान सिंह चाटुकार जीवनशैली सदृश्य दरबारी हिन्दू सेनापतियों का खामियाजा राष्ट्र कमोवेश हजार वर्षो की गुलामी के रूप में भुगतान करता रहा है। लोकतांत्रिक संसदीय संस्करण के नीति-नियंताओं के लिए संचेतना है। वर्तमान संसदीय एक भूल भी पृथ्वीराज चौहान से कहीं ज्यादा भयावह तस्वीर पेश कर सकता है। तत्कालीन भारतीय समाज मनुस्मृति संविधान संचालित था जिसके जीवन आदर्श नैतिक मूल्यों की पराकाष्ठा आदर्श मानक थे। 21 वीं शताब्दी भारतीय समाज धन केंदित आदर्श मानक हैं। शोषित अतृप्त क्षुधा राष्ट्रवादी भाषण नहीं सुन सकती है। वह क्षुधा और भी भूखी होती है जब सामने बैठा कोई अन्य भारतीय भाई कमिशन्ड आफिसर पूरी मालपूवा खा रहा है तथा राष्ट्रवादी गीत गा रहा हो। भूक बढती ही नहीं वरण पदेन वरिष्ट पदाधिकारी के खिलाफ जबरदस्त रोष पैदा होती है। ऐसे मनोबोल तैयार करती अग्निपथ योजना दुष्परिणामों से राष्ट्र बेखबर है। भाातरत्न अटल बिहारी गुरुकुल छात्र वर्तमान रक्षामंत्री सैनिक मनोबल शव्दों के लाभदायी संसदीय संस्करण प्रयोग महारत सिद्ध सुशिक्षित प्रोफेसर हैं लेकिन सैनिक मनोबल क्या चीज है,अनभिज्ञ हैं। उन्हें किसी समग्र चिंतन के सैनिक से संसद से बाहर बंद कमरे में खुले दिल से बात करना चाहिए। उन्हें अटल संस्कृति के राष्ट्र सर्वोपरि विशिष्ट अध्यायों का पुनरावलोकन भी करना चाहिए। उनके वर्तमान संसदीय भााषण "जय जवान,जय किसान,जय विज्ञान " लाल किले पुुरातन घोषणाओं को खुली चुनौती देती प्रतीत होती है। क्या कोई राष्ट्र सर्वोपरि राजनीतिक प्रतिबध्दता सुशिक्षित प्रोफेसर अपने गुरुकुल भाषणों को विस्मृत कर सकती है? विपरीत परिस्थितियों में समाधान प्रस्तुत करना चाणक्य राजनीतिक जीवन है। अन्यथा आमजनमानस मतदातागण भी राष्ट्रवाद के लच्छेदार भाषण दे सकती है बाबजूद इसके आप किसान परिवार सुशिक्षित भौतिक विज्ञान प्रोफेसर रक्षामंत्री हैं। युग परिवर्तन कालखंड के शासकीय व्यक्तित्व का वर्तमान तथा भविष्य के प्रति महती ऐतिहासिक भूमिका है,आप अग्निपथ योजना पर गंभीर समग्र चिंतन करे। निस्संदेह, 21 वीं शताब्दी सेना विभाग संहारक हथियार अवलंबित है। इस संदर्भ में रक्षामंत्री का इजराइल डील सराहनीय हो सकते हैं बावजूद इसके प्रोफेसर रक्षामंत्री को याद रखना चाहिए कि महाभारत युद्ध में भी संहारक अस्त्रों के प्रयोग किसी भी रूप में कमतर नहीं थे। दिव्यास्त्र,बह्मस्त्र सरीखे आधुनिक अणु बम संहारकों की कमी नहीं थी लेकिन उन सभी उत्कृष्ट संहारक अस्त्रों को कर्ण, अर्जुन,दोणाचार्य,भीष्मपितामह, अभिमन्यु जैसे सैनिक प्रतिज्ञा के प्रशिक्षण तपस्या की दरकार थी।अपरिपक्व तपस्या, प्रशिक्षण का अश्वत्थामा बह्मास्त्र प्रयोग दुष्परिणामों से भारतवर्ष अवगत है। सौभाग्यवश,अपरिपक्व अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र प्रयोग को नेस्तनाबूद करने हेतु भगवान कृष्ण की माया प्रत्यक्ष थी फलत: परीक्षित गर्भ सुनिश्चित करते हुए भविष्य के मानव धर्म हस्तिनापुर की रक्षा हो सकी थी। आज भारतीय संसद में दारिका गुजरात परिक्षेत्र के अन्यान्य सासंद हैं लेकिन कोई भी कृष्णावतार नहीं है। अतएव,अपरिपक्व अश्वत्थामा रूपी आधुनिक अग्निवीर का खामियाजा राष्ट्र भुगतान कैसे करेगा? आप सिविल सोसाइटीज नीतिनियंता पांच वर्षो की राष्ट्रीय प्रतिबदता शपथ-पत्र एक बार राष्ट्रपति के समक्ष लेकर कर्तव्यों की इतिश्री करते हैं। अग्निपथ योजना उसी इतिश्री का परिणाम है। एक सैनिक अपने सैनिक प्रतिज्ञा पत्र को प्रत्येक वर्ष के संबंद्ध सेना दिवस पर अपने समकालीन कमांडिंग आफिसर के समक्ष लेता एवं दुहराता है। आप आधुनिक नीति-नियंताओं के लिए शपथ-पत्र के कोई मायने नही है क्योंकि अनुबंधीय अग्निवीर शपथ-पत्र सेना कानून सम्मत नहीं है। सिविल सोसाइटीज मीडिया हाउस स्तंभकारों विशेषकर "स्वामीनोमिक्स" तथा चेतन भगत लेख की सेना विभाग अनभिज्ञता का अपरिपक्व अश्वत्थामा रूपी अग्निवीर नहीं थोपा जाना चाहिए। तत्कालीन पदेन सेनाध्यक्ष जनरल नारावणे बगैर संस्तुति अग्निपथ घोषणा विशिष्ट चिंतन का विषय है। क्या आजीवन सेना विभाग चहारदीवारी के भीतर रहने वाले सेना विभाग तत्कालीन प्रमुख की बगैर सहमति की नीतिगत घोषणा सुुरक्षित भारतवर्ष की गारंटी हो सकती है? दरअसल,15-20 वर्षीय संघर्षपूर्ण सैनिक जीवन पुरातन गुरुकुल सदृश्य अनुशासित नागरिक उत्पादन नीति रही है। जेल यात्रा से लेकर वनवासी जीवन विशिष्ट मानव संसाधन निविर्वाद सत्य है तो सेना संघर्षपूर्ण प्रशिक्षण क्षेत्र उत्कृष्ट मानविकी उर्वर भूमि है। संघर्षपूर्ण सेना विभाग वनवासी जीवन जंगल,जेल,अंग्रेजियत शोषित व्यवस्था मानसिक दबाव आदि का सम्मिलित परिक्षेत्र है। फलत: सेेना विभाग राष्ट्रवादी अनुशासित डीएनए नागरिक राष्ट्र को समर्पित करता रहा है। सेना विभाग परिक्षेत्र प्रशिक्षित सैनिक बम निरोधक दस्ते का गारंटीयुक्त संसाधन आजीवन होता है। अग्निपथ योजना बम निरोधक सिविल सोसाइटीज दस्ते पर प्रतिबंध सदृश्य नीति है। अग्निपथ योजना के सभी अभ्यर्थियों को सुरक्षाबल चिंतन की आजीवन बाध्यता है। जबकि संघर्षपूर्ण सेना जीवन अपरिमित योगदान क्षमता प्रशिक्षण उर्वर क्षेत्र है। दुर्भाग्यवश, सिविल सोसाइटीज नीति नियंताओं की सेना विभाग उत्कृष्ट उत्पादन अनभिज्ञता का परिणाम अग्निपथ योजना है। यह गौरतलब है कि अन्यान्य उत्कृष्ट प्रदर्शन मानविकी सेना संस्थानों के प्रशिक्षित नागरिक रहे हैं। पुष्कर सिह धामी,मुख्यमंत्री,उत्तराखंड (भूतपूर्व वायुसैनिक,वायु सेना), एस.जयशंकर,माननीय विदेश मंत्री,भारत सरकार, (भूतपूर्व छात्र, वायुसेना विद्यालय, सुब्रतो पार्क,नई दिल्ली),चिराग पासवान,माननीय मंत्री,भारत सरकार) से लेकर कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां उत्कृष्ट योगदान का मानव संसाधन सेना विभाग संस्थान प्रशिक्षित न हो। उत्कृष्ट मीडिया हाउस प्रभावशाली योगदान की अंजना ओम कश्यप, राहुल कंवल से लेकर अन्यान्य पत्रकार, मैनेजर ,संपादक मंडल सेना स्कूल, संस्थान प्रशिक्षित हैं। राष्ट्रीय परिदृष्य में सभी उत्कृष्ट बैंककर्मी सेेना विभाग प्रशिक्षित हैं। भूतपूर्व सैनिक बैंककर्मी उत्कृष्ट योगदान के संदर्भ में एसबीआई मैनेजिंग डायरेक्टर तत्कालीन संस्तुतित विचार नीतिनियंताओं के लिए विचारणीय है। इतना ही नहीं वालीवुड सितारे ऐश्वर्य राय, सुष्मिता सेन से लेकर प्रियंका चोपडा तक सेना विभाग संस्थानों से संबद्ध, प्रशिक्षित रही है। स्पष्टत: सेना विभाग प्रशिक्षित मानव संसाधन का राष्ट्रीय जीडीपी योगदान अव्वल है। आखिर अपरिमित संभवनाओं के मानव जीवन को सुरक्षाबल योगदान सीमित योजना यथार्थवादी कैसे हो सकती है? अपरिमित संभवनाओं के अपरिपक्व जीवन (मैट्रिकुलेशन) को शोषण,भेद-भाव के अपरिमित वृहद कमरे में ढकेलकर, चार वर्ष बाद अधिकतम को बाहर रोड पर खड़ा कर यह कहना कि आप सभी सुरक्षात्मक कार्यो हेतु 10% आरक्षण के धनी मानव संसाधन हैं। क्या उत्कृष्ट मानव संसाधन प्रशिक्षक सेना विभाग अग्निपथ योजना भविष्य उज्जवल है? क्या अन्यान्य गरीब परिवार अपरिपक्व (मैट्रिक-अंतर स्नातकीय छात्र)शहजादों की गंंभीर राष्ट्रीय जनसंख्या को आरक्षण आश्रित मानव संसाधन विकास की योजना राष्ट्र निर्माण सहायक है? अग्निपथ योजना विशिष्ठ रेखांकित तथ्य कि गंंभीर जनसंख्या के गरीब परिवार शहजादों को सुरक्षा गार्ड आरक्षण आश्रित मानव संसाधन का राष्ट्रीय पैकेज,किसी भी स्तर पर लाभकारी नही है। स्पष्टत: आरक्षण की वैशाखी तैयार करता मानव संसाधन विकास राष्ट्र विघातक है। यह अतिशयोक्तिपूर्ण नही है कि भारतीय पारसी समाज से लेकर शरणार्थी अन्यान्य समुदाय नागरिकों का राष्ट्रीय योगदान,सहभागिता बेमिसाल रहा है। दशकों आरक्षण आश्रित राष्टीय समुदाय आज भी आरक्षण आश्रित हैं जबकि बिना किसी आरक्षण के विशिष्ठ पदों के योगदानी बिना आरक्षण आश्रित पारसी,शरणार्थी सह अन्यान्य समाज है। स्पष्टत: गरीब शहजादो की गंभीर जनसंख्या को आरक्षण आश्रित सुरक्षागार्ड पैकेज गरीबों को गरीब बने रहने को मजबूर करने की अदूरदर्शी योजना अग्निपथ है। यह तथ्य भी गौरतलब है कि अग्निपथ योजना के सभी अभ्यर्थी गरीब परिवार शहजादें है। किसी नेता या अन्यान्य सबल परिवार का कोई वारिस अग्निपथ अभ्यर्थी नहीं होगा। नीतिगत पैरोकारों की दलील कि इसके तहत रोजगार अवसर का सृजन होगा,भावनाओं का पटाक्षेप मात्र है। क्या पूर्व की सैनिक नियुक्ति नीति में रोजगार सृजन नहीं होता था? संक्षेप में, अबतक सेेना विभाग पारित कानूनों में सह-अस्तित्व की झलक कमोवेश दिखती थी। अन्यान्य नीतिगत घोषणाओं में सैनिक तथा अधिकारीगण दोनों कमोवेश विराजमान होते थे। हां, "बडी मछली छोटी मछली भक्षण" प्राकृतिक सिद्धांत विराजमान होता था। संभवत: अग्निपथ प्रथम संसदीय संस्करण है जिसमें विशेष तौर पर 97 % सेना मानव संसाधन जिसके अभ्यर्थी गरीब परिवार के शहजादे होते हैं,की राष्ट्रीय जिम्मेदारी,भावनाओ, उत्पादक क्षमताओं को नजरअंदाज किया गया है।भेदभाव,शोषण,अदूरदर्शिता की ऐसी अधिकृत घोषणा का संसदीय संस्करण अन्यत्र दुर्लभ है। योजना इतनी कारगर है तो इसे सेना के 3% अधिकारीगण नियुक्ति नीति हेतु भी लागू किया जाना चाहिए था। बेशक, गरीब परिवारों की गारंटीड गरीबी तो राष्ट्रीय मानव संसाधन विकास प्रतिरोधक संसदीय संस्करण का नाम अग्निपथ योजना है। यह भी गौरतलब है कि मानव विकास इतिहास में युद्धों का अपना विशिष्ट योगदान है। बग़ैर युद्धों के मानव इतिहास की चर्चा बेमानी है। अपरिमित विध्वंसात्मक क्षमता के दिव्यास्त्रों,बह्मस्त्रों के ऐतिहासिक काल में भी तपस्वी मानव संसाधनों की अहमियत का युद्ध इतिहास रहा है।अतएव,मानव विकास इतिहास के महत्वपूर्ण कारक सेना विभाग अग्निपथ योजना समग्र चिंतन का कानून नहीं है। बदलाव राष्ट्रीय अपरिहार्यता है। अस्तु, सैनिक संघर्षपूर्ण जीवन राष्ट्रीय खजाने चिंतन का विषय नही है। उत्कृष्ट मानव संसाधन प्रशिक्षक सेना विभाग को सुरक्षा गार्ड सीमित चिंतन का अग्निपथ योजना अविलंब बंद हो। पुर्व की सैनिक नियुक्ति का परिमार्जित स्वरूप 21 वीं शताब्दी की महती आवश्यकता है। किसी अल्पकालिक कारणवश परिमार्जित न भी हो तो कम से कम पुर्ववत् व्यवस्था की बहाली को नजरअंदाज लंबे समय तक नहीं किया जा सकता है। समग्र चिंतन दर्शन के सैनिक नियुक्ति नीति-निर्माण अपरिहार्य है।
राष्ट्र सर्वोपरि मिशन
पुर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई पर अनर्गल मीडिया आरोपों से आहत तत्कालीन पदेन सुचना प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज के मीडिया प्रतिबंध फाइल पर हस्ताक्षर करने से मना करते हुए पंडित अटल जी उद्गार थे "सुषमा जी! राष्ट्र मुझसे बडा है, मैं रहूं न रहूं, राष्ट्र रहना चाहिए।" फलतः मीडिया लेखन,प्रसारण सुरक्षित रहा। दरअसल, सभी सजग नागरिक राष्ट्र सर्वोपरि कार्यकर्ता हैं लेकिन तदनुरूप विशुद्धता का जीवन एक कठोर योग है जिसके आदर्श भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेई थे। बेशक,कठिन योग एक दुरूह जीवन है। कोई वैरागी ही कठोर योगी हो सकता है। निस्संदेह, टाटा ट्रस्ट,रेमंड,रिलायंस आदि कार्पोरेट उद्यमिता भारतीय आदर्श हैं। फलत: राष्ट्र आथिर्क सशक्तीकरण की ओर अग्रसर है। शिक्षा क्षेत्र में भी उत्कृष्ट संस्थानों के रूप में सिंबयोसिस,एमआईटी,पुणे व अन्य से राष्ट्र आच्छादित व गतिशील है। युग परिवर्तन कालखंड झलक राष्ट्र गान " जन गण मन " की आवाज सुनाई देते ही आज सड़क पर चलते राहगीर नागरिक भी सावधान मुद्रा में तबतक रूक जाते हैं जबतक कि गान पूर्ण न हो। यह एक व्यापक राष्ट्रीय जनमानस बदलाव है। कैसे हुआ?कौन किया ? कब हुआ ? गौण विषय है। बदलाव दृष्टिगत है। यही महत्वपूर्ण है। अन्यान्य सांगठनिक मानक बदलाव करने शेष हैं। कालखंड प्रायोजित मांग है। प्रकृतिस्थ चिंतन साकार हो,राष्ट्रीय संचेतना है। हमारी राष्ट्रीय उपलब्धियां बेमिसाल हैं वाबजूद इसके आदर्श माडल की प्राप्ति शेष है। महान दार्शनिक अरस्तू के शव्दों में "मानवीय जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि समाज सेवा रूपी राजनीतिक जीवन में विराजमान है।" राष्ट्र सर्वोपरि उत्कृष्ट समाज सेवकों का योगदान आदर्श की प्राप्ति अभीष्ट हैं।हमारी बेमिसाल उपलब्घियां अविस्मरणीय महामानव व्यक्तित्वों के कठिन योग की परिणति है। 21 वीं शताब्दी उतरार्ध सनातन विश्व समाज की आगामी जिम्मेवारी निर्वहन हेतु हमें आदर्श मानक की प्राप्ति शेष है। यह गौरतलब है कि सामाजिक सांस्कृतिक चिंतन संरक्षण हेतु उत्कृष्ट समाज सेवक प्रजाति की मांग अनवरत है। मानव समाज व्यवस्था ग्रंथ मनुस्मृति पाठकों की मजबूत समाज सेवक प्रजाति अपरिहार्य हैं। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई मनुस्मृति जानकार राजनेता थे तो उन ग्रंथों के जानकार वानप्रस्थी नेताओं की बची खुची संख्याबल अपने अंतिम पड़ाव पर हैं। मानव समाज संविधान जानकार उत्कृष्ट नेताओ की अनवरतता हेतु माडल सामाजिक संगठन अपरिहार्य है। राष्ट्र सर्वोपरि मिशन उन्हीं चिंतनों में से एक है।सफलता-असफलता, योगदान प्रकृति नियोजित है, तो ब्रांडेड राष्ट्र सर्वोपरि मिशन संस्थान चिंतन "गहना कर्मणोगति" सर्वसुलभ संविधानिक अधिकार प्रयोग है। न कोई दावा न अत्युक्ति है। मानवीय जीवन अच्छाईयों एवं बुराइयों का पुलिंदा है। अवतारी महामानव भी प्रश्नों से घिरते रहें हैं। वैसे में साधारण मानवीय काया से भूल-चूक न हो,कल्पनातीत है।उपलब्धियों-नाकामियों का विश्लेषण आमतौर पर इतिहास का विषय है। लेकिन अच्छा हो कि समय रहते अपनी भूल-चूक का संभव विश्लेषण सुगम हो। पंडित जवाहरलाल नेहरू सरकार भूलों का परिमार्जन वर्तमान सरकार ने किया है तो वर्तमान सरकार की भूल-चूक अपने कार्यकाल में ही संभव हो, पत्रिका मिशन है। बेशक,पुरातन पीढी राजनीति चाटुकारिता व प्रतिभा सह-अस्तित्व सामंजस्य का रहा है। यह कहना गलत होगा कि पंडित नेहरू कैबिनेट में चाटुकारी संस्कृति नहीं थी लेकिन वे राजनीतिक चाटुकार भी बेमिसाल प्रतिभावान थे। सत्तापक्ष सदैव बलवान रहा है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि राष्ट्र व मानवता की तीलांजलि देकर सबकुछ जायज हो। सम्प्रति राजनीति चाटुकारिता संक्रमित है। अदूरदर्शी शून्य शराब नीति चाटुकार संस्कृति नीति-नियंताओं की देन है। फलत: बिहार में लाखों निर्दोष माताओं,बहनों का सुहाग उजड चुका है। यह दुखद है कि नेता ही नहीं वरण वर्तमान फिल्मोद्योग वालीवुड अभिनेता प्रजााति भी चाटुकार संस्कृति अवलंबित है। लाखों परिवार मानवता हत्यारे शून्य शराबनीति मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए "बिहार का गांधी" स्टेज शो आयोजित करते हैं। गणमान्य वक्ताओं में बेमिसाल गायक उदितनारायण के चाटुकारिता शव्द विन्यास यह सोचने को विवश करते हैं कि भौतिकतावाद अकूत धन बेकार है। यदि सबकुछ पाने के बाद भी शून्य शराब दर्शन मानवता हत्यारे किसी मुख्यमंत्री की चाटुकारिता करनी पड़े,कहा जाना चाहिए सारी उपलब्धियां बेकार हैं।हमारी सबलता का कोई अंश मानवता व राष्ट्रीय आकांक्षाओं को तिरोहित करे,वह मानवीय जीवन सफलता बेकार है। कुछेक प्रतिभावान राजनीतिज्ञ कदाचित कोल्डस्टोरेज जीवन जीने को विवश होते हैं। यह नेहरू के जमाने में भी था,आज भी होता है। अंतर सिर्फ इतना है कि पुरातन राजनीतिज्ञ प्रतिभावान व प्रतिभा पूजक दोनों होते थे। प्रतिभावान व प्रतिभा पूजक अच्छाई मानी जा सकती है। कदाचित क्षेत्रवाद आदि आक्षेपित प्रतिभा पूजन भी उत्कृष्ट राष्ट्रवाद हो सकती है। लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ वशीभूत चाटुकारिता पूजन निष्कलंक राष्ट्रवाद नहीं हो सकता है। संक्षेप में, मानव समाज संविधान मनुस्मृति जानकार नीतिनियंताओं के विशुद्ध पौधों को जागृत रखते हुए भविष्य के समाज सेवकों में भी मनुस्मृति संस्करण उत्पन्न हों,राष्ट्र सर्वोपरि मिशन है। अस्तु,आगे के पृष्टों में, कुछेक प्रमुख राष्ट्रीय व्यक्तित्वों, नीतिगत विंदुओं पर प्रस्तुत लेख विशुद्ध रूप में राष्ट्र सर्वोपरि मिशन चिंतन-मनन है। लेख प्रस्तुतिकरण राष्ट्रीय सजगता प्राप्त करे तथा सनातन पंचामृत गुरू, गंगा,गाय, गीता,गायत्री विश्वव्यापी बनें। राष्ट्र सर्वोपरि मिशन है।
राष्ट्रीय रोज़गार नीति
राष्ट्रीय प्रतिभा के संवर्धन,संरक्षण में रोजगार नीति महत्वपूर्ण हैं जबकि इस संदर्भ में वर्तमान रोजगार नीति गंभीर रूप में चिंतनीय है। स्वछंद नियुक्ति अधिकार,सेवा विस्तार शोषण, संवैधानिक अधिकार ध्वस्त करते भेदभावपूर्ण रोजगार नीति बाह्मण-हरिजन भेदभाव शोषण के पुरातन भारत से कहीं ज्यादा भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग-अनुबंधीय तथा परमानेंट कर्मचारी-संघर्ष भारत-पाकिस्तान तस्वीर पेश करता है। उसमें उच्च अधिकारियों का अनुबंधीय कर्मचारी नियुक्ति स्वछंद अधिकार हरिजन शोषण भेद-भाव वाले कालखंड से कहीं ज्यादा भयावह है। तदनंतर उच्च अधिकारी द्वारा अनुबंधीय कर्मचारियों के एक वर्षीय सेवा विस्तार अधिकार का शोषण दुरुपयोग इस कदर सर्वव्यापी है कि सेवा विस्तारक हस्ताक्षर अधिकारी पुरातन भारत बाह्मण हैं तो आवेदक कर्मचारी पुरातन भारत हरिजन से भी ज्यादा शोषित है।वर्तमान भारतवर्ष में बाह्मण-हरिजन कमोवेश गौण हो चुके हैं।लेकिन आधुनिक रोजगार नीति उस भेदभाव मूलक सामाजिक स्वरूप की वापसी है। यथार्थवादी चिंतन बदलाव अपरिहार्य है। 1. आउटसोर्सिंग रोजगार नीति: अंग्रेजों की आउटसोर्सिंग नीति जिसके तहत भारतीय मजदूर मारीशस,सुरीनाम आदि देशों में जाते थे तद्नतर विस्थापित हुए। लेबर सप्लाई अनुबंध के आउटसोर्सिंग प्रावधान में गरीब मानविकी बेजुबान जानवर है। आधुनिक भारतीय ठेकेदारों के लिए आउटसोर्सिंग नीति अंग्रेजियत दीवाली है। गरीब लेबर बेजुबान जानवर हैं, जिनके सभी नागरिक अधिकार स्थगित हैं।आखिर गरीब बेजुबान जानवर कहां विस्थापित होंगे? अक्षरशः वर्तमान आउटसोर्सिंग नीति अंग्रेजियत शोषण नीति है। ऐसी नीति जिसमें गरीब मजदूर वर्ग के नाम पर कमीशन तथा अन्य छुपी सेवा चार्ज ठेकेदारों के लिए सदैव दिवाली है तो कमचारियों के शोषण की अकथनीय पीडा के संदर्भ में पुछा जा सकता है कि क्या वे भारतीय नागरिक नहीं हैं? 2.अनुबंधीय रोजगार नीति: निस्संदेह,अनुबंधीय कर्मचारी भी भारतीय नागरिक हैं बावजूद इसके विभिन्न विभागों के स्थायी तथा अनुबंधीय संघर्ष का स्वरूप ऐसा है जिसमें भारत-पाकिस्तान की लड़ाई प्रतिबिम्बित है। राष्ट्रीय सीमा के भीतर भारत-पाकिस्तान रूपी कर्मचारी-संघर्ष नीतिगत घोषणाओं की असफलता है जिसमें अनुबंधीय कर्मचारियों के नागरिक अधिकार भेदभाव की नयी परिभाषा गढ़ती दिखती है। समावेशी अनुबंधीय कर्मचारी नीति के तहत मानव अधिकारों,अनावश्यक संघर्षों की समस्याओं पर विराम लगाया जाना चाहिए।निस्संदेह, हतोत्साहित,शोषित मानव संसाधन राष्ट्रीय चिंता का विषय है। 3. अव्यवहारिक श्रमिक कानून: १२ घंटे का श्रमिक कानून विश्व प्रथम का हमें दावा करा सकता है लेकिन अपने मानवीय संपदा के साथ नाइंसाफी,भेदभाव की नई प्रजाति तैयार करती नीतियां,राष्ट्र निर्माण सहायक नहीं हैं।औद्योगिक क्रांति सवश्रेष्ट लाभार्थी राष्टों में भी अधिकतम ८ से ९ घंटे का श्रमिक कानून है। मानव शरीर की क्षमताओं, विषमताओं की चिंता से बाहर का भारतीय श्रमिक कानून राष्ट्रीय मानविकी स्वास्थ्य से लेकर अन्यान्य मानकों की अवहेलना,पुनर्विचार अपरिहार्य है। कार्यालय में बैठकर मैनेजमेंट का पाठ बारह घंटे पढाये जा सकते है। लेकिन शारीरिक श्रम आठ घंटे से ज्यादा अप्राकृतिक है। २१ वीं शताब्दी सबल सनातन भविष्यवक्ता युग ऋषि श्री राम शर्मा आचार्य जी के शब्दों में "किसी व्यवस्था में १२ घंटे काम करने वाले मालिक,आठ घंटे वाले नौकर, चार घंटे वाले चोर"। शारीरिक श्रम करने वाला कोई नौकर १२ घंटे खड़े रहकर अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित नहीं रख सकता है, पुनरावलोकन अपरिहार्य है। बेशक,अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की सस्ते मजदूर उपलब्धता का लाभ चीन को मिलता रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक मजदूर कानून आवश्यक है लेकिन सामंजस्यपूर्ण नीतिगत चिंतन अपरिहार्य है।अपरिमित शोषणकारी,अकथनीय भेदभावपूर्ण मजदूर नीति प्राकृतिक नहीं है। इतने बडें पैमाने पर सभी विभागों का वर्तमान स्वरूप आउटसोर्सिंग व अनुबंधीय कर्मचारी दो-तीन परमानेंट अधिकारीगण के रहमोकरम पर आश्रित हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या के राष्ट्रीय मानविकी के लिए कोई अधिकृत फोरम तक नहीं है जहां कोई समस्या सूचित व रजिस्टर्ड हो सके, यह सोचने को विवश करती है कि क्या ऐसा स्वछंद शोषण अधिकार कानून की घोषणा आजाद भारत के नेतागण कर सकते हैं? हर समस्या के लिए यदि न्यायिक अपील करनी पडे तो फ़िर सरकार किसलिए ? आधुनिक भारतवर्ष का स्वरूप पुरातन भारत बाह्मण-हरिजन स्वरूप से भी निम्नतम की नीतिगत घोषणा का बन चुका है। निस्संदेह, अनुबंधीय आउटसोर्सिंग रोजगार वर्तमान नीतिगत स्वरूप सभी मानवीय जीवन मानकों को ध्वस्त कर रहा हैं। इतना ही नहीं, पुरातन भारत हरिजन अपनी पहचान इजहार करने से हिचकते थे आज भारतीय समाज में अनुबंधीय आउटसोर्सिंग कर्मचारी भी अपनी अनुबंधीय अवस्था खुलेआम बयान करने से बचते हैं।राष्ट्रवादी भाषण जिसका मूलतत्व सह अस्तित्व सामंजस्यता स्थापित करना अनिवार्य है। अन्यथा अपरिमित भेदभाव शोषण युक्त व्यवस्था राष्ट्र निर्माण मिशन घातक ही नहीं हजार वर्ष गुलामी सदृश्य कारक तत्व हैं। समग्र चिंतन परिमार्जन अनिवार्य है। यह कहना गलत होगा कि अनुबंधीय रोजगार नीति पूर्णत: बेमानी है। संविधानिक अधिकार सुरक्षित भेदभाव रहित शोषण मुक्त निर्धारित अवधि का अनुबंधीय रोजगार अवसर अंतरराष्ट्रीय मजदूर प्रतिस्पर्धात्मक प्रतिपूर्ति आवश्यक है। लेकिन अंतराष्ट्रीय मजदूर प्रतिस्पर्धा हेतु भारतीय समाजिक आवरण सुरक्षा भी आवश्यक है। हां,आउटसोर्सिंग रोजगार नीति पूर्णत: आधुनिक दास-प्रथा है। विशेष मामलों में लेबर सप्लाई आउटसोर्सिंग हो सकती है। लेकिन प्रोफेशनल नियुक्तियां आउटसोर्स्ड हो, गंंभीर चिंतनीय है कि नियुक्ति की बदौलत बिचौलिए डायमंड पहनें और पसीना बहानेवाले न्यूनतम समर्थन मजदूरी में भी कमीशन, घूस के रूप में बडी राशि से वंचित हों। रोजगार नीतिगत बदलाव ने अधिकांश विभागों में दो वर्ग उत्पन्न किये हैं। एकतरफ गिने चुने संख्याबल के परमानेंट अधिकारी वर्ग हैं तो दूसरी तरफ आउटसोर्सिंग-अनुबंधीय संवैधानिक अधिकार वंचित मजदूर बेजुबान जानवर हैं। शोषण,भेद-भाव अकल्पनीय दौर में है जिसे किसी राष्ट्रीय लेख में बयान नहीं किया जा सकता है। अधिकारियों के स्वछंद नियुक्ति,सेवा विस्तार अधिकार, महिला-पुरुष शोषण की अकथनीय अनगिनत तथ्य ह्दय विदारक हैं। स्वछंद अधिकार अनुबंधीय रोजगार योजना में क्षेत्रीय, जातीय, महिला-पुरूष भेदभाव का स्तर सभी मानकों को ध्वस्त कर रहा है। संभवत: ध्वस्त check & balance व्यवस्था के कारण संबंधित विभागों को इसकी खबर तक नहीं है क्योंकि शिकायतकर्ता तत्काल प्रभाव से अंग्रेजियत बाह्मण ठेकेदार का कोपभाजन शिकार होकर रोड पर खडे होने से भयभीत होते हैं। क्या उन बेजुबान शोषित राष्ट्रीय मानव संसाधन की चिंता करनेवाला कोई सरकार व मंत्रीगण हैं? यदि हां,तो यह पत्रिका लेख प्रमाणिक तथ्यों पर आधारित है जिसके प्रमाणिक रिकॉर्ड महासंघ कार्यालय में उपलब्ध हैं। संक्षेप में,पुरातन भारत बाह्मण-हरिजन शोषण भेदभावपूर्ण समाज पीछे छुट रहा है। कुछेक विभाग ऐसे हैं जहां एक से दो बाह्मण सदृश्य परमानेंट अधिकारी कार्यरत हैं। शेष आउटसोर्सिंग तथा अनुबंधीय रोजगार नीति के बेजुबान शोषित हरिजन हैं। बाह्मण सदृश्य कुछेक यथार्थवादी अधिकारी भी अपने सहायक वर्ग स्थिति पर भावविभोर हैं लेकिन मूकदर्शक विवश हैं। निस्संदेह, राष्ट्रीय सामाजिक चिंतन सब-के-बस की बात नहीं है। यह एक बेहतरीन बेमिसाल कार्य है जिस हेतु सभी मानवीय जीवन समय नहीं निकाल पाते हैं। पुरातन भारत शोषण,भेदभाव दुष्परिणाम से भारतवर्ष सदियों जुझता रहा है। धर्मान्तरण,अविरल विदेशी शासन के मूल वजह हमारे भेदभावपूर्ण समाज रहें हैं। सौभाग्यवश,आधुनिक भारत में कमोवेश जातिगत भेदभाव गौण हो चुके हैं। हमारी नीतिगत चिंतन भेद-भाव रहित समाज बरकरार रखते हुए होनी चाहिए। महात्मा गांधी के शव्दों में "वर्ग भेद प्रकृति का अटूट सत्य है"। बेशक, आधुनिक समाज वर्ग भेद स्वरूप अधिकारी-चपरासी, अधिवक्ता,चिकित्सक, प्रोफेसर आदि हैं। हमारी नीतिगत चिंतन किसी छ्द्म जातीय संघर्ष की नयी बोतल से बाहर की होनी चाहिए। अधिकारी-चपरासी सह अस्तित्व रोजगार नीतिगत घोषणा आवश्यक है। दुर्भाग्यवश, आउटसोर्सिंग, अनुबंधीय रोजगार नीतिगत घोषणा पुरातन भारतवर्ष जातीय भेदभाव की नयी बोतल है। यथार्थवादी नीतिगत बदलाव चिंतन अपरिहार्य है। अंत में, सत्तासीन व्यक्तित्व,अधिकारीगण आदि यह न सोचें कि ऐसे भेदभावपूर्ण समाज निर्माण का शिकार उनका परिवार नहीं है। उन्हें क्यों चिंता करनी चाहिए? राष्ट्र सबका है। सबल समाज निर्माण लाभ सबको मिलेगा। अकथनीय समस्याओं का सामना आपके अगली पीढी को करना पड सकता है। प्रकृति अविरल है। आप नहीं तो आपकी आनेवाली पीढी मे कोई चपरासी बन सकता है। अतएव,भविष्य चिंतन मानवीय जीवन है। अधिकारी-चपरासी क्षणिक हैं। आदर्श समाज चिंतन जिसमें अधिकारी-चपरासी सह अस्तित्व नीतिगत बदलाव अपरिहार्य है। 21 वीं सदी उतरार्ध सनातन विश्व समाज स्थापना के बीज आदर्श भारतीय समाज चिंतन में विराजमान हैं। आइये, इस संदर्भ में अपनी हिस्सेदारी का योगदान सुनिश्चित करें।
