Vision & Mission

Mission & Vision

The Vedic proclamation "संघे शक्ति कलियुगे" highlights the power of unity in this era, mirroring the missionary zeal driving global evolution in Nation Today. This evolution is the result of numerous outstanding federations since the pre-independence era, with envisioned commitments essential for the evolution of human society. Federations ensure the eternity of these commitments, transcending individual mortality in pursuit of a mission. Akhil Bhartiya Sainik Evam Asainik Mahasangh, constituted under the *Nation First*missionary, aims to be a Centre of Excellence Social Organisation, adapting to changing world scenarios. MAHASANGH, a 21st-century social rejuvenation initiative, has envisioned a Memorandum for benchmarked actions within the Sanatan World. Nature's cycle includes dominant phases: the Vedic World, the Organised Christian World, and now a rotation towards an organised Sanatan World. This natural cycle towards a Sanatan World Order has been foreseen for the second half of the 21st century. MAHASANGH aims to contribute to this upcoming Sanatan World. The guiding philosophy of MAHASANGH is rooted in the concept of a Utopian society, rewarding citizens according to their worth, free from discrimination based on region, caste, or creed. Current policy-makers often maintain a mindset reminiscent of the British Colonial Rule. In Amritkal Bharat, many are deprived of a level playing field despite their education, skills, and acumen, due to policies not aligned with Manusmriti. Talent discrimination leads to migration and conversions, requiring care in the upcoming Sanatan World, where human resources are paramount. Nation Today has set benchmarks in corporate houses and educational hubs through entrepreneurship (viz. Tata, Reliance, Raymond). Religious missions ISCON, AWGP and ARYASAMAJ too have aspirational dominance. While these sectors have aspirational benchmarks for the 21st century, a benchmarked Social Organisation is missing. Our Nation engages in social endeavours through various organizations, each having their due share towards contributing to the evolution of Nation Today. Some are known for their affiliations with particular government eras, Mahasangh pursues missionary goals across all eras, maintaining Nation First discourses. Mahasangh is determined to be a Centre Of Excellence Social Organisation. MAHASANGH will have membership schedules under Primary, Secondary, and Lifetime categories, along with Advisory Councils for all States. Roles will be demarcated based on competency, moving away from old organizational models. In consonance with new and evolving paradigms, the central headquarters of MAHASANGH will remain in Pune, with state headquarters located in their respective cities. During the winter season, the headquarters for Mahasanghs’ functionaries will shift to their respective villages. It is therefore envisioned that amidst the Hindu festivals of Deepawali to Holi, the National and State Presidents of MAHASANGH will operate from their respective villages, thereby gaining firsthand experience of ground realities and generating further innovative ideas and actions. To counter societal challenges like conversions, a pragmatic approach is needed. Welcoming everyone's participation is a core value of this mission. Committed aspirations for present and future acknowledgment define MAHASANGH, ensuring talents are not debarred due to past circumstances and offering revival plans for humanity. MAHASANGH's Articles of Association commit members for life, under three principles: 1. परद्रव्यं लोष्टवत् (Paradravyaṁ Loṣṭavat): Obligation against financial irregularities. 2. मातृवत् परदारेषु (Mātṛvat Paradāreṣu): Commitment to women Empowerment. 3. आत्मवत् सर्वभुतेषु (Ātmavat Sarvabhuteṣu): Judging others as one judges oneself. MAHASANGH serves as a forum for discourses, seeking resolutions for cultural and social challenges. It envisions submissions for upgrades and modifications to accomplish the Sanatan Bharat mission. With a commitment to nature, MAHASANGH invites those dedicated to humanity to join this module for a New World order Bharat. MAHASANGH, under *Nation First* Trusteeship, is committed to establishing a benchmarked Social Organisation for a 21st Century Sanatan Bharat.

Mission & Vision

युग परिवर्तन,उत्थान-पतन सामयिक राष्ट्रीय संगठनों की भी मांग करता है। विगत शताब्दी के अन्यान्य बेमिसाल सांगठनिक योगदानों का वर्तमान भारतीय समाज ॠणी है। फलत:"संघे शक्ति कलियुगे" अवधारणा राष्टीय उत्तरदायित्वों,चितनों का सामयिक सामाजिक संगठन "अखिल भारतीय सैनिक एवं असैनिक महासंघ" है। वस्तुत: वर्तमान शताब्दी युग परिवर्तन का है। युग ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य वांग्मय तात्विक चिंतन-दर्शन सह पश्चिमी भविष्यवक्ताओं,विश्लेषणों में 21 वीं शताब्दी उतरार्ध विश्व गुरू भारत पुनर्स्थापना का है। व्यापक जिम्मेवारी निर्वहन हेतु राष्ट्रीय तैयारी अपरिहार्य है। घिसे-पिटे, लकीर के फकीर, क्षेत्रीय, खण्डित जातीय संगठनों से इतर सामयिक सामाजिक संगठन की आवश्यकता 21 वीं शताब्दी के भारतवर्ष को है। तदनुरूप प्रतिपूर्ति दर्शन "महासंघ"है। प्रकृतिस्थ किसान,सैनिक सभी घोषणाओं के अभिन्न अवयव हैं बावजूद इसके त्रस्तता विराजमान है।व्यवस्था निर्माण हेतु प्राकृतिक नीति आवश्यक है।राष्ट्र की सभी घोषणाएं समग्र रूप में प्रकृतिस्थ हों,महासंघ मिशन है। अमेरिकन इतिहास के 47 राष्ट्रपतियों में 33 सैनिक रहें है,परिणाम प्रेरणादायी है। जबकि भारतवर्ष में सैनिक सुरक्षा गार्ड योगदान आरक्षण आश्रित हैं। प्राकृतिक सजगता के यथार्थवादी राष्ट्रीय सजगता का सामयिक संस्करण "महासंघ"है। गंगा सिंचित उर्वर बिहार भूमि मरणासन्न अवस्था हमारी प्राकृतिक सजगता पर प्रश्न चिह्न है। बिहार समाज के अनगिनत परिवारों की असमय कालकवलित जिम्मेदार शून्य शराब बंदी कानून है। अतएव,अन्यान्य अप्राकृतिक नीतिगत सजगता के यथार्थवादी चिंतन,योगदान का सामयिक तंत्र "महासंघ" है। दरअसल, महती भूमिका के लोकतांत्रिक सरकारों के परिवर्तनकारी युग में यथार्थवादी समग्र चिंतन की "सत्यं ब्रुयात प्रियं ब्रुयात" तथा "निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय" मूल मंत्र सद्भावना शैली की गौणता अप्राकृतिक कानूनों की मूल वजह है। वर्तमान चिंतन,प्रस्तुति त्वरित रूप में गूगल बाबा पर आश्रित है।पश्चिमी अन्वेषक गूगल बाबा प्राकृतिक नीतिगत घोषणा नहीं कर सकते हैं? सामयिक राष्ट्रीय संगठन अन्वेषण सहयोग अपरिहार्य है। गुरुकुल पाठ्यक्रम "सत्यं ब्रुयात,प्रियं बुयात" संस्करण के संसदीय तर्क की प्राकृतिक संतुलन व्यवस्था को पुन: प्राप्त करना होगा। गुरुकुल पाठ्यक्रम शिक्षण संस्थानों से राष्ट्र आच्छादित हो,महासंघ चिंतन दर्शन में शामिल है। गतिमान राष्ट्र को गतिशील चिंतन आवश्यक है। यथार्थवादी समग्र नीतिगत चिंतन संसदीय अभाव की प्रतिपूर्ति सामयिक संगठनों को करना होगा। "सत्यं ब्रुयात प्रियं ब्रुयात" भारतीय परिपाटी का आधुनिक सामयिक राष्टीय सजग तंत्र,महासंघ है। प्रकृतिनिष्ट मानवीय जीवन की महत्वपूर्ण धारा हिन्दू-मुस्लिम पृथ्वी अक्षीय उत्तर-दक्षिण धुव्र हैं। एक धुव्र के बगैर दूसरे की परिकल्पना बेमानी है। अतएव,संबंद्ध प्रतिबध्दता के प्रति यथार्थवादी कुछ चिंतन हो सके,यथेष्ट प्रकृतिनिष्ट जीवन है। महान दार्शनिक अरस्तु के शव्दों में "मानवीय जीवन का उच्चतम स्तर समाज सेवा है"। स्पष्टत: समाज सेवा की प्राथमिक इकाई आत्म परिष्कार से लेकर राष्ट्र निर्माण योगदान कृतसंकल्पित सामयिक राष्ट्रीय संगठन महासंघ है।रेमण्ड,टाटा ट्रस्ट कार्पोरेट उद्यमिता के आदर्श हैं तो राष्ट्र सर्वोपरि आदर्श मानक का समाज सेवा केंद्र महासंघ बने,कामना है। 20 वीं शताब्दी के अन्यान्य बुढाते सामाजिक संगठनों की विशिष्ठ कमियों में सत्ता परिक्रमा तथा मंचासीन होने के विवादों की अकथनीय गाथा है। ऐसी कुछेक दृष्टिगत विशिष्ठ कमियों का यथार्थवादी परिमार्जन महासंघ है,मसलन:- 1• महासंघ राष्ट्रीय अध्यक्ष सरकार नामित कोई पद आजीवन नहीं ले सकता है। अन्यान्य सांगठनिक अध्यक्षों की सरकार आश्रित चिंतन,परिक्रमा का परिमार्जन करते विधि सम्मत व्यवस्था का सामयिक संगठन महासंघ है। 2• महासंघ सभाओं की वैधता हेतु कम से कम दो नये वक्ताओं को अवसर प्रदान करना अपरिहार्य है। अन्यान्य संगठनों के माइक विवादों की अकथनीय विकरालता परिणामों से जुझते राष्ट्र के समक्ष महासंघ अन्यान्य परिमार्जन घोषणाओं के साथ राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत है। यह गौरतलब है कि सामाजिक संगठन ही नहीं बल्कि धार्मिक संगठनों के माइक संघर्ष, विवाद दुष्परिणाम भयावह रहें हैं। अन्यान्य संगठनों का जन्म माइक संघर्ष का परिणाम होता है तो धार्मिक संगठनों की माइक संघर्ष तो धर्म परिवर्तन तक का साक्षी बनती है।अतएव, इस संदर्भ में समग्र चिंतन परिमार्जन दर्शन के साथ "महासंघ" राष्ट्र के समक्ष है। निस्संदेह,विशिष्ठ चिंतन,घोषणा-पत्र के अपरिमित संगठनों से अच्छादित राष्ट्र गुलामी,अप्राकृतिक भेद-भाव की जकडनों से आज भी त्रस्त है। हमारी कार्य-शैली की अगंभीरता को रेखांकित करता है तथा प्रकृतिस्थ,यथार्थवादी,भेद-भाव रहित व्यवस्था निर्माण की मांग करता है। गांधी के शब्दों में "वर्ण व्यवस्था प्रकति का अटूट सत्य है।" जिसका वर्तमान स्वरूप अधिकारी तथा चपरासी हैं। 21 वीं सदी भारतवर्ष व्यवस्था निर्माण के अवयवों में चपरासी से लेकर अधिकारी भेद-भाव रहित सहभागिता,अधिकारों की सुनिश्चितता है। वर्तमान भारतवर्ष को पुराने माडल बाह्मण-हरिजन नीतिगत चितनों से बाहर अधिकारी-चपरासी आधुनिक माडल के भेद-भाव रहित नीतिगत चिंतन की अपरिहार्यता है। महासंघ इस संदर्भ में चिंतन,योगदान सुनिश्चित करे,कामना है। स्पष्टत: विशिष्ठ चिंतनों की फलीभूतता की गारंटी व्यवस्था निर्माण है। दर्शनों,चितनों की व्यक्तिगत पूंजी से कोशों दूर सांगठनिक चिंतन घोषणा व्यव्स्था निर्माण है। यह अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है ब्रांडेड सामाजिक संगठनों की अपनी अहमियत होती है। 21 वीं सदी भारतवर्ष को बेमिसाल कार्पोरेट उद्यमिता रेमण्ड,टाटा ट्रस्ट रूपी सामाजिक संगठनों की आवश्यकता है जिनके योगदान की गारंटी व्यक्तिवादी न होकर संगठनात्मक हो। अस्तु,महासंघ कार्यशैली अपने स्थापना दर्शन "राष्ट्र सर्वोपरि मिशन-Nation First" के ब्रांडेड सामाजिक संगठनों में शुमार हो,हिमालय सुक्ष्म सत्ता युग ऋषि सद्भावना,आशीर्वाद संरक्षण प्रार्थी है। बेशक, एक राष्टीय सामाजिक संगठन के लिए राष्ट्र सर्वोपरि के लच्छेदार दार्शनिक लेख प्रकाशित करना बेहद आसान है लेकिन उसे घरातल पर उतारना एक लंबी जद्दोजहद हो सकती है जिसकी फलीभूतता की एकमात्र गारंटी हिमालय सुक्ष्म सता युग ऋषि दे सकते हैं तो "गहना कर्मणोगति" का अपना मानवीय जीवन प्राकृतिक अधिकार प्रयोग है। यथार्थवादी राष्ट्रवाद,आत्मपरिष्कारित प्रकृतिनिष्ठ कुछेक. समाज सेवक जीवन राष्ट्र को समर्पित करने का लक्ष्य महासंघ हासिल करे,राष्ट्र देवता निवेदित है। लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2024 संबोधित भारतवर्ष में एक लाख यथार्थवादी समाजसेवी गैरराजनीतिक परिवार प्रतिभा खोज प्रधानमंत्री घोषणा का यथार्थवादी तंत्र महासंघ बने,कामनाओं में शुमार है। अतएव,सभी भारतीय नागरिक जो प्राथमिक स्तरीय आत्म परिष्कार से लेकर राष्ट्र निर्माण चिंतन ,योगदान के यथार्थवादी समाज सेवी मानवीय जीवन आंकाक्षी हैं, निम्नलिखित शपथ-पत्र सहमति के साथ, महासंघ निःशुल्क प्राथमिक सदस्यता अभियान में आमंत्रित हैं। हमारा सामाजिक जीवन निम्नलिखित शपथ-पत्र प्रतिबिंबित होगा:- 1. परद्रव्यं लोष्टवत् :- अर्थात दूसरे के धन के प्रति कोई लोभ लालच नहीं होना। मूल रूप में किसी लेने-देन वित्तीय अराजकता में सहभागिता से दूरी रखने की प्रतिज्ञा का शेष जीवन महासंघ है। 2. मातृवत् परदारेषु :- अर्थात पराये स्त्री के प्रति उच्च स्तरीय आदर्श जीवन अनुगामिता केंदित है। उच्च जीवन आदर्श केंदित आपका सामाजिक जीवन महिला सशक्तिकरण के प्रति सजगता का शपथ-पत्र है। 3. आत्मवत् सर्वभुतेषु:- परपीडा को अपनी पीडा का समग्र चिंतन परिमार्जन महासंघ शपथ-पत्र है। स्पष्टत: समस्याओं के केंद्र में अपने को रखकर चिंतन मंथन उपरांत परिमार्जन प्रस्तुति का शेष जीवन महासंघ है। संक्षिप्तत: राष्ट्र प्रहरी महासंघ सदस्यता का मेरा शेष जीवन यह शपथ लेता है कि अपने जीवन को स्वस्थ,सफलतम बनाते हुए वैसी कार्यशैली,जीवन क्रम से परहेज करूंगा जिससे कोई अन्य जीवन आहत,अप्राकृतिक अथवा अस्वस्थ बने। स्पष्टत: स्वयं का स्वस्थ्य रहन-सहन तथा दूसरों को स्वास्थ्य प्रेरक चेतना महासंघ राष्ट्र प्रहरी शपथ-पत्र है। व्यक्तित्व परिष्कार प्राकृतिक अविरलता प्राप्त करे, महासंघ शीतकालीन सत्र(दिवाली से होली तक) मुख्य कार्यालय(Headquarters) ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत होगा। पदेन राष्ट्रीय अध्यक्ष का पैतृक गांव महासंघ का शीतकालीन तो स्थायी Headquarters पुणे,महाराष्ट्र घोषित है। आइए! हम सभी प्रकृतिनिष्ठ नागरिक "अखिल भारतीय सैनिक एवं असैनिक महासंघ" सक्रिय समाज सेवी सदस्य राष्ट्र प्रहरी बनें तथा आत्म परिष्कारित समाज सेवी गौरव राष्ट्र देवता को समर्पित करें।